17 मार्च 2019 - 16:43
न्यूज़ीलैंड में जनसंहार, कैसे बना चरमपंथियों के लिए उपहार?  ट्रम्प क्यों आलोचना नहीं करते?

सीरिया में अमरीकी तथाकथित गठबंधन, दाशइ के खिलाफ " कार्यवाही" में व्यस्त है और वह दाइश के अंत की घोषणा करने की तैयारी कर रहा है एसी दशा में दुनिया अचानक ही न्यूज़ीलैंड में एसी घटना देखती है जो दाइश से कम नहीं बल्कि अधिक खतरनाक है।

 पश्चिमी देशों में इस्लामोफोबिया कोई नयी बात नहीं है लेकिन नयी बात यह है कि अब यह बीमारी, सशस्त्र आतंकवाद का रूप धारण कर रही है और , नफरत फैलाने वाले भाषणों, क़ब्रों पर गंदगी फैलाने और मार पीट की घटनाओं से बढ़ कर रक्तरंजित हमलों में बदल गयी है।

     न्यूज़ीलैंड की मस्जिद में हमला करने वाले आतंकवादी ने 73 पेज की विचारधारा में कहा है कि उसने यह हमला, गोरों की रक्षा के लिए किया है और यह कि पश्चिम में पलायनकर्ताओं की संख्या बढ़ रही है जिससे गोरों का समाज खतरे में है।

  इस नस्लभेदी विचाराधारा के अगुवा, अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प हैं। ट्रम्प इस नस्लभेदी व खुंखार विचारधारा के जनक हैं केवल इस लिए नहीं कि उन्होंने सात इस्लामी देशों के नागरिकों के अमरीका प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा है बल्कि इस लिए भी कि उन्होंने बड़ी बेशर्मी के साथ, न्यूज़ीलैंड के हमले को आतंकवाद कहने से इन्कार कर दिया।

     यह जनंसहार, इस्लामी चरमपंथियों के लिए क़ीमती तोहफा है विशेषकर दाइश और अलक़ायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए क्योंकि इस घटना के बाद उनके लिए पश्चिम में नस्लभेद का शिकार युवाओं को अपनी ओर खींचना बेहद आसान हो जाएगा।

     इस लिए सीरिया में दाइश के आखिरी ठिकाने " बाग़ूज़" पर सीरियाई सेना के क़ब्ज़े का अर्थ अब शायद, दाइश का अंत न हो बल्कि वह केवल भूमिगत हो जाएंगे क्योंकि इस आतंकवादी संगठन और इस प्रकार के अन्य संगठनों के फलने फूलने का माहौल  पूरी तरह से मौजूद है।

 पश्चिमी सरकारों ने, इस्लामोफोबिया के प्रति लापरवाही करके बहुत बड़ा अपराध किया है। उन्होंने इस्लामी से आतंक के बारे में न तो कानून बनाए और न ही उसे रोकने की कोशिश की जैसा कि उन्होंने यहूदियों के लिए किया। हम ब्रिटेन के पूर्व विदेश मंत्री के उस बयान को नहीं भूल सकते जिसमें उन्होंने नकाब़ लगाने वाली मुस्लिम महिलाओं का अपमान किया था और इसी प्रकार ट्रम्प के उस बयान को भी जिसमें उन्होंने कहा था कि यूरोपीय देशों का सामाजिक ढांचा ,पलायन से बदल रहा है। शायद वह यह भूल गये कि समाज के ढांचे को सब से पहले, गोरे साम्राज्यवदियों और पलायनकर्ताओं ने बदला और उत्तरी अमरीका पर क़ब्ज़ा करके वहां के स्थानीय लोगों की नस्ल तक मिटा दी।  

     अफसोस की बात तो यह है कि इस्लामोफोबिया पर अधिकांश इस्लामी देश चुप हैं । न्यूज़ीलैंड की मस्जिद में जो हुआ वह शायद इस प्रकार की पहली घटना हो किंतु निश्चित रूप से अंतिम नहीं होगी जब तक पश्चिमी नेता, मुसलमानों के खिलाफ बयान बाज़ी से बाज़ नहीं आएंगे और उन सब के सरगना, ट्रम्प अपनी ज़बान पर लगाम नहीं लगाएंगे।